सुलग उठता है मेरा रोम-रोम.........

by: upendra Singh (on: Mar 22, 2018)
Category: Other   Language: Hindi
tags: friends
हमने कब मायूस लौटाया किसी मेह्मान को
अपनी कश्ती अपने हाथों सौंप दी तूफ़ान को

जिसकी ख़ातिर आदमी कर लेता है ख़ुद को फ़ना
कितना मुश्किल है बचा पाना उसी पहचान को

फिर न रख पाएगा वो महफ़ूज़ क़दमों के निशाँ
साथ जब मिल जाएगा आँधी का रेगिस्तान को

ऐ मेरे अश्को! मुझे इक बार कह दो शुक्रिया
मार दी ठोकर तुम्हारे वास्ते मुस्कान को

ज़िंदगी तो ज़िंदगी है, ज़िंदगी की क्या बिसात
जो नज़रअंदाज़ कर दे मौत के फ़रमान को

जान ले लेगी किसी दिन बंद कमरे की घुटन
खोल दो खिड़की को, दरवाज़े को, रोशनदान को

तन-बदन ही क्या, सुलग उठता है मेरा रोम-रोम
ठेस लगती है किसी अपने से जब सम्मान को

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980 days ago
Thanks to all of u friends
 
 
980 days ago
super
 
 
980 days ago
Rating: 10
 
 
981 days ago
ज़िंदगी तो ज़िंदगी है, ज़िंदगी की क्या बिसात
जो नज़रअंदाज़ कर दे मौत के फ़रमान को !
Very nice ....
 
 
981 days ago
Rating: 10
 
 
981 days ago
so touchy but very good
 
 
981 days ago
Rating: 10
 
 
981 days ago
Superb!!!!!!!
Ekkkkk number..sachi jindagi koi visaat nhiiii.
 
 
981 days ago
Rating: 10
 
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