"जिन्दगी की दौड़ में,*

by: upendra Singh (on: Mar 24, 2018)
Category: Poem   Language: Hindi
tags: fRIENDS
*"जिन्दगी की दौड़ में,*
*तजुर्बा कच्चा ही रह गया...।"*
*" हम सीख न पाये 'फरेब'*
*और दिल बच्चा ही रह गया...।"*
*"बचपन में जहां चाहा हँस लेते थे,*
*जहां चाहा रो लेते थे...।"*
*"पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए,*
*और आंसुओ को तन्हाई..।"*
*"हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह,* *अन्दाज़ से..."*
*देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में ..।*
*"चलो मुस्कुराने की वजह ढुंढते हैं...*
*तुम हमें ढुंढो...हम तुम्हे ढुंढते हैं .....!!"*
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976 days ago
gd
 
 
976 days ago
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