गर्मियों की छुट्टियाँ

by: removed (on: Apr 24, 2018)
Category: Other   Language: Hindi
tags: Neel from his soul
गर्मियों की छुट्टियाँ
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न जाने गर्मी का मौसम आने पर क्यों मन “nostalgic” सा होने लगता हे, अचानक ही कभी बचपन में बिताई गई गर्मियों की छुट्टियों की यादें स्मृति पटल पर उभरने लगती हे। हिंदी माध्यम के स्कूलों में फाइनल परीक्षा ख़तम होते ही छुट्टियाँ शुरू हो जाती थी, आज कल के जैसे फिर से नई क्लास/सेशन नहीं चालू होते थे। जिस दिन अंतिम पेपर रहता था उस दिन मन ख़ुशी के मारे प्रफुल्लित रहता था दोस्तों के साथ छुट्टियों के प्लान शेयर किया करते थे उस वक़्त होम वर्क भी नहीं दिया जाता था तथा घर वाले भी गर्मी की छुट्टियों में पढने की जिद नहीं करते थे।
अंतिम पेपर दे कर घर आते ही पुराने केरमबोर्ड को निकला जाता था तथा उसे धुप दिखाई जाती थी फिर बड़े जतन से सांप-सीढ़ी/ लूडो आदि खोजे जाते थे और भाई बह्नों और दोस्तों के साथ खेला करते थे। उन दिनों कजन शब्द का मतलब नहीं मालूम था ,चाचा, मामा बुआ के बच्चे भी भाई बहन होते थे।
पुराने ताश की गड्ढी भी निकल कर दहला पकड़, सत्ती लगवानी जोड़ी बनाओ जैसे खेल खेलते थे, बड़े लोग ताश में रमी खेलते थे जो हमें खेलना नहीं आता था। चाक से आँगन या कमरे मैं अष्टा-चंगे का बोर्ड बनाया जाता था, और इमली के बीजों को आधा तोड़ कर जिसे चिया कहा जाता था पासे बना कर ये गेम खेला जाता था।
पुरानी अखबार/ किताबों के ढेर से सुमन सौरभ, नंदन , चम्पक और अन्य किताबें और कॉमिक्स निकल कर पढ़ा करते थे, कई बार पढ़ कर के भी उन्हें फिर से पढने में बहुत मजा आता था।
डिग्री-सेंटीग्रेड जैसे शब्द का मतलब तो बड़े होने के बाद पता चला बचपन में तो भरी दुपहरी में घुमा करते थे। फिर वो आम के पेड़ से कच्ची केरी तोड़ कर खाना और वो भी नमक और मिर्ची के साथ आज भी याद कर मुह मैं पानी आ जाता हे, कुछ केरी घर में भी ले जाते थे और फिर मम्मी उस के साथ पुदीना, मिर्ची और गुड के साथ खट्टी मीठी चटनी बनाया करती थी। इसी मौसम में जंगल जलेबी भी खूब तोड़ के खाया करते थे।
दुपहर में जब मोहल्ले में आइसक्रीम वाले की लकड़ी के डंडे की एक विशेष प्रकार की आवाज आती तो मन खिल उठता था मम्मी से 25-25 पैसे लेके वो बर्फ वाली लाल, नारंगी आइसक्रीम खाने का मजा ही कुछ और था. कुल्फी का स्वाद भी लाजवाब था. बर्फ के गोला ले के अलग अलग प्रकार के शरबत डाल कर खाना बड़ा अच्छा लगता था । गन्ने का रस दो रुपये का एक गिलास आता था पर पैसे ज्यादा नहीं होते थे इसलिए एक रुपये का आधा गिलास रस ही पिया करते थे। कैम्पा कोला, थ्रिल, थम्स-अप जैसे कोल्ड ड्रिंक पीना बहुत बड़ी पार्टी माना जाता था।
गर्मियों की छुट्टियों का पुरे साल भर इंतज़ार रहता था तो उसका एक मुख्य कारण था कॉमिक्स। साल भर भर गुल्लक में पैसे इकट्ठे करते थे और इनसे लाइब्रेरी से कॉमिक्स ला के पढ़ा करते थे , वो चाचा चौधरी का कंप्यूटर से भी तेज़ दिमाग, वो साबू के गुस्से से जुपिटर पे ज्वालामुखी फट पड़ना, वो पिंकी और बिल्लू की शरारतें, नागराज के शारीर से निकलने वाले सांप, वो सुपर कमांडो ध्रुव की फाइटिंग , बांकेलाल और हवालदार बहादुर की हंसी से भरपूर हरकतें आज भी याद आती हे तो मन को गुदगुदा देती हे. मनोज कॉमिक्स की राजा रानी की कहानियां मन को बहुत लुभाती थी। बड़ी दीदी को नावेल पसंद था तो उनके लिए नावेल लाना पड़ता था. जब थोड़े से बड़े हुए तो बाल पॉकेट बुक्स पढने लगे, राजन-इकबाल के जासूसों कारनामें बड़े मजेदार होते थे।
आज कल लाइट का ना होना परेशानी का सबब होता हे पर बचपन में जब शाम और रात को अक्सर लाइट जाया करती थी जब पूरा मोहल्ला घर के बहार अपनी आँगन या छतों पर होता था , और शुरू होता था “ बैठे बैठे क्या करें करना हे कुछ काम शुरू करो अन्ताक्षरी ले के प्रभु का नाम.....” और जिसे गाना नहीं भी आता वो भी गाना गाता था।

शाम होते ही घर की छत को झाड पोंछ कर पानी से सींचा जाता था ताकि सारी गर्माहट निकल जाए, रात को खाना खाने के बाद छत पर लाइन से बिस्तर लागाये जाते थे, हलकी हलकी चलने वाली हवा बिस्तर पर लेट कर खुले आकाश को निहारना, और अपनी कल्पनाशीलता से आकाश में नई नई आकृतियाँ देखना, बड़े सुकून वाले पल थे वो। मम्मी पूछा करती थी आकाश में सप्तऋषि और ध्रुव तारा कहाँ हे...और हम आकाश में उन्हें खोजा करते थे। छत पे एक कोने में ठन्डे पानी से भरी सुराही और गिलास भी रखी जाती थी जिससे बार बार पानी निकल कर ठंडा पानी पीते थे...रात में मम्मी की कहानियां सुनते सुनते कब नींद आ जाती थी पता हा नहीं पड़ता था।

आज सारी सुख सुविधाओं के होने के बाद भी लाखों रुपये खर्च करके भी हम वो गर्मी की छुट्टियों का मज़ा और सुकून नहीं खरीद सकते.

AMIT
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936 days ago
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940 days ago
Sometimes I feel why did we grow up? Neel
 
 
940 days ago
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944 days ago
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946 days ago
बचपन साथ रखियेगा, ज़िन्दगी की शाम में,
उम्र महसूस ही न होगी, सफ़र के मुक़ाम में !
 
 
946 days ago
Sabkuch badal gaya hai, neelu.. Paisa kamane ki race mei sab piche choot gaya hai, bachpan ke wo din kya din they.. Phir se wo din aaye to?
 
 
946 days ago
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