ठहरा हुआ हूँ, इक ज़माने से मैं....

by: upendra Singh (on: Jun 16, 2018)
Category: Poem   Language: Hindi
tags: friends
ठहरा हुआ हूँ, इक ज़माने से मैं
हटता क्यों नहीं तेरे निशाने से मैं।
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सातों सुर मिल के, धुन छेड़ देते हैं
तिलमिलाता हूँ इक, तराने से मैं।
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रूठ कर टूटने का शौक़ अब ख़त्म
मान जाता हूँ बस, मनाने से मैं।
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खुद को खो देने का, डर नहीं रहा
फायदे मे हूँ अब, तुझे गँवाने से मैं।
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779 days ago
awsm
 
 
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782 days ago
Superb
 
 
782 days ago
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783 days ago
Nice lines
 
 
784 days ago
SUPERB
 
 
784 days ago
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