ज़िंदगी

by: 📒My Diary✍❤My Life✍ ✍.. (on: Aug 9, 2018)
Category: Other   Language: Hindi
tags: ..
ज़िंदगी तूने जो सिखाया उसे भूलना चाहती हूँ

ए ज़िन्दगी! इस बार मैं तुझे ही समझना चाहती हूँ

उतार रही हूँ हर वह सरनामा जो दिया तूने

कौन हूँ मैं, बस अब यही जानना चाहती हूँ

न ग़म ही सच्चा है न सिर्फ़ ख़ुशी है मक़सद

मेरी जिदगी का सही मायने तलाशना चाहती हूँ

मिटा रही हूँ फ़लसफ़े जो निफाक और अथला हैं

कोरी सलेट पे फिर मैं ,खत रूह को लिखना चाहती हूँ

खुली आँखों की बरसों की नींद को झाड़

मूँद कर आँखें कुछ पल, मैं अब जागना चाहती हूँ
score: 9.30162
average: 10.0
Ratings: 2
 
« send to friends»
URL (link) to this writing. You can copy and paste this in your email to send to your contacts:
 
Not good
Ok
Excellent!
 
 
 

Comments

[View All Comments]
 
838 days ago
Haan dard kafi time tak sath rehte hai...lekin hamesha nahi rehte waqt k sath wo dard nikal jata hai....bas rehta hai...gherai tak ki us dard k nishaan ...dikhte nahi kisi ko...anadar hi andar reh jate hai....so kabhi kisi ko dard nai dena hai
.
 
 
838 days ago
दो कदम तो सब चल लेते हैं
पर जिंदगी भर कोई साथ नहीं देता
अगर रोने से भूला दी जाती यादें
तो हंसकर कोई गम न छुपाता!
 
 
838 days ago
दर्द बनकर ही रह जाओ हमारे साथ....
सुना है दर्द बहुत वक़्त तक साथ रहता है...
 
 
839 days ago
ज़िंदगी है ज़रा सी अरमान बहुत हैं.
हमदर्द नही कोई इंसान बहुत हैं
दर्द-ए-दिल सुनाए तो सुनाए किसको
जो भी के करीब है वो अंजान बहुत हैं
 
 
839 days ago
बहुत समझाया अश्क़ो को तन्हाई मे आया करो,
महफ़िल मे हमे यूँ रुसवा ना करवाया करो,
इतने मे आँसू तड़प कर बोला,
भीड़ मे आपको तन्हा पाते हैं,
बस इसलिए चले आते है !!
 
 
839 days ago
सुन्दर
 
 
839 days ago
Rating: 7
 
 
839 days ago
बहुत खुबसूरत ।
 
[View All Comments]