Bankar

by: anand anand (on: Aug 17, 2018)
Category: Poem   Language: Hindi
tags: Poem
मिलकर युं ही बीछडती है परछांईयाँ फकत,
ना मिला कोई , नूर ए अलम आईना बनकर

आरपार देखलुं नजारा, ओर नजर का हुनर
ईश्क हकीकी ,मिला ना कोई रुहाना बनकर

दर्द ओर जख्म की परवाह ,कहाँ है दिल को
मरहमी अंदाज मैं जीता हुँ दिल ए नूर बनकर

रास्ते अजीब से ,चले आ रहे मेरी तरफ यारों
मैं मिलना चाहता बस, रुहानी मंजिल बनकर
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