दामन तुम्हारा फिर पकड़ना सीख रहा हूँ...

by: upendra Singh (on: May 14, 2019)
Category: Poem   Language: Hindi
tags: friends
उसकी तरह मैं ज़िद पर अड़ना सीख रहा हूँ
तकदीर हूँ, कुछ कुछ बिगड़ना सीख रहा हूँ

मैं भूल गया था बिछड़ना पिछली मर्तबा
मिलकर उसे, उससे बिछड़ना सीख रहा हूँ

इक ज़ख्म देकर उसने अपना तार्रुफ़ दिया
खंजर हूँ मैं, सीने में गड़ना सीख रहा हूँ

गिरने पे मेरे एतराज़ कर रहे हो क्यूँ
पंछी नया नया हूँ, उड़ना सीख रहा हूँ

मुझे फेंकने वाले के हुनर पे सवाल कर
मैं हुक्म का इक्का हूँ, पड़ना सीख रहा हूँ

पतझड़ में जो बहार है वो मेरे दम पर है
मैं आखरी पत्ता हूँ , झड़ना सीख रहा हूँ

देखो नहीं झटकना इस बार मुझको तुम
दामन तुम्हारा फिर पकड़ना सीख रहा हूँ
score: 9.43918
average: 10.0
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559 days ago
Thanks to all of u friends
 
 
560 days ago
Beautiful
 
 
560 days ago
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560 days ago
wonderful poem
 
 
560 days ago
Rating: 10
 
 
561 days ago
bahoot khub yahi to aaj ke jamane me ho raha hai ,
 
 
561 days ago
Rating: 10
 
 
562 days ago
superb
 
 
562 days ago
Rating: 10
 
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