उलझनें हैं बहुत..मग़र,......

by: upendra Singh (on: Nov 17, 2020)
Category: Poem   Language: Hindi
tags: friends
उलझनें हैं बहुत..मग़र,
सुलझा लिया करता हूँ..
और, फोटो खिंचवाते वक़्त..
मैं अक्सर मुस्कुरा लिया करता हूँ..
क्यूँ नुमाइश करुँ...
अपने माथे पर शिकन की..
मैं, अक्सर मुस्कुरा के...
इन्हें मिटा दिया करता हूँ...
जब लड़ना है,
खुद को खुद ही से..
तो, हार-जीत में..
कोई फ़र्क नहीं रखता हूँ..
हारुँ या जीतूं..
कोई रंज नहीं.
कभी खुद को जिता देता हूँ..
तो, कभी खुद से जीत जाता हूँ..
ज़िंदगी, तुम बहुत खूबसूरत हो..
इसलिए मैंने तुम्हें..
सोचना बंद और..
जीना शुरु कर दिया है..
score: 9.43918
average: 10.0
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Comments

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62 days ago
Rating: 10
 
 
64 days ago
शायद अब मै जीना शुरू कर दिया हूं
इसलिए केवल लिखता हूं
जवाब देने के बाद पुनः उलझन में पड़ जाता हूं
धन्यवाद दोस्त
 
 
64 days ago
Rating: 10
 
 
64 days ago
BAHOT HE SUNDAR
 
 
64 days ago
Ekkk number upenji....khud se juto aur khud se haro.......... Cha gye aap...
Aapne khud likhi hai ?
 
 
64 days ago
Rating: 10
 
 
64 days ago
bahut sundar hai.......kya apne likha hai..?
 
 
64 days ago
Rating: 10
 
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